गुरुवार, 7 अप्रैल 2016

बुरे का फल बुरा ही मिलता है : कहानी

एक ठाकुर और एक नाई के बेटे में बड़ी मित्रता थी| नाई का बेटा बड़ा कुब्दी (कुटिल) व ठाकुर का बेटा बड़ा भोला था| ठाकुर और ठकुराइन के अलावा गांव के लोगों ने भी कुंवर को काफी समझाया कि नाई के बेटे से मित्रता छोड़ दो यह आपके लिए ठीक नहीं है कभी ये मित्रता आपको भारी पड़ जायेगी, पर ठाकुर के बेटे किसी की एक ना मानी| एक दिन नाई के बेटे ने कुंवर को कहा कि चलो कहीं कमाने चलते है| माँ-बाप ने कुंवर को काफी मना किया पर वह नहीं माना, और नाई के साथ चल दिया|
ठकुरानी ने सोचा बेटा रास्ते में दुःख पायेगा सो उसने चुपके से कुंवर को बीस सोने की मोहरें दे दी ताकि बुरे वक्त में काम आ जाये|
दोनों घर से विदा हो कमाने के लिए चले| रास्ते में कुंवर ने नाई से कहा - " खाने पीने की चिंता करने की जरुरत नहीं है, माँ ने मुझे बीस सोने की मोहरें दी है |" कहते हुए कुंवर ने मोहरे नाई को दिखा दी| बस नाई को तो मोहरें देखते ही मन में लालच आ गया और वह रास्ते चलते सोचने लगा कि कैसे कुंवर छुटकारा पा कर मोहरें हड़पी जाय|
चलते चलते उन्हें प्यास लगी और इधर उधर देखने पर जंगल में एक कुंवा दिखाई दिया, दोनों ने साथ में लायी रस्सी से लोटा बांध पानी निकालने के लिए लटकाया पर रस्सी थोड़ी छोटी थी सो कुंवर बोला- " मैं रस्सी पकड़ कर कुंए में झुक रहा हूँ तूं मेरे पैर कस कर पकड़े रखना ताकि झुक कर मैं पानी निकाल सकूं|"
कुंवर के झुकते ही नाई ने तो कुंवर को कुंए में धक्का दे दिया| और उसके थेले को जिसमे कपड़े व बीस मोहरें रखी थी उठाकर चलता बना|
कुंवर ने देखा पानी के ऊपर कुंए की दीवार पर एक पत्थर निकला हुआ था जिस पर वह आसानी से बैठ सकता था सो कुंवर उस पत्थर पर आकर बैठ गया| उस कुंए में दो भुत भी रहते थे|
रात होते ही दोनों भूत कुंए में आये और आपस में बात करने लगे| एक भूत बोला - " मुझे तो आजकल बहुत आनंद आ रहा है|"
"क्या बात कर रहा है यार "पेमला" कैसा आनंद ? बता तो सही| दूसरे भूत ने पुछा|
"मत पूछ "देवला"|आजकल खाने को रोज नित नया भोजन मिल रहा है| खा खाकर आनंद उड़ा रहा हूँ| पास में जो शहर है उसके राजा की बेटी के शरीर में घुस जाता हूँ और जो खाने का दिल करता है मांग लेता हूँ| राजा ने बहुतेरे झाड़ फूंक वाले बुलाये पर मैं उनसे कहाँ निकलने वाला हूँ| मुझे निकालने की जो तरकीब है कि-" कोई मनुष्य अपनी जांघ से खून निकालकर तुलसी के पत्ते पर लगाकर झाड़ फूंक करता हुआ जिसके शरीर में घुसा हूँ पर फैंके तभी मैं निकल सकता हूँ पर ये तरकीब कोई जानता नहीं और मुझे निकाल सकता नहीं |" कह कर पेमला भूत खूब हंसा|
आगे देवला भूत कहने लगा- "वाह ! तेरे तो मजे है| और मेरे भी, मैं भी आजकल सोने की मोहरों पर लेटता हूँ|"
"कैसे ? पेमला भूत ने पुछा|"
"पास ही में जो तपस्वी की बावड़ी है उसके पास जो बरगद का पेड़ है उसकी जड़ों में सोने की मोहरों का खजाना छिपा है और मैं उस पर सोता हूँ| वो पूरा खजाना मेरे कब्जे है |" देवला भूत ने पेमला भूत को बताया |
"पर किसी को पता चल गया और कोई खजाने को निकाल ले गया तो तूं तो कंगाल हो जायेगा|" पेमला भूत ने आशंका जताई |
"किसी को पता लग भी जाए तो क्या ? मुझे भगाने की तरकीब भी तो किसी को आनी चाहिए| सुन यदि कोई कड़ाह में तेल गर्म कर बरगद की जड़ में डालकर ही कोई मुझे वहां से भगा सकता है और ये कोई जानता नहीं|" देवला भूत बोला|
कुंवर दोनों की बातें छुपकर चुपचाप सुन रहा था| दिन उगते ही भूत तो वहां से चले गए और कुछ देर बाद वहां से गुजरते एक ग्वाला ने कुंए में पानी के लिए रस्सी लटकाई जिसे पकड़ कर कुंवर ने ग्वाले से उसे बाहर निकालने का आग्रह किया| विपदा में पड़े व्यक्ति की सहायता करते हुए ग्वाला ने कुंवर को कुंए से बाहर निकाल दिया|
कुंए से बाहर आते ही कुंवर ने उसी शहर की राह पकड़ी जिस शहर के राजा की राजकुमारी के शरीर में वह भूत घुसता था| राजा ने घोषणा कर रखी थी कि जो राजकुमारी के शरीर से भूत निकाल उसे मुक्त करा दे उसे मुंह माँगा इनाम मिलेगा| कुंवर ने देखा राजमहल में कई ओझा और तांत्रिक जमा थे वह सीधा राजा के पास गया और कुंवरी को भूत से मुक्त करने की जिम्मेदारी लेते हुए राजा से बोला-
"इन सब ओझाओं को यहाँ से हटाओ और मुझे कुंवरी के पास ले चलो|"
राजा ने सभी को हटाने का आदेश दे कुंवर को कुंवरी के पास ले गया , कुंवरी तो एक बड़ा थाल भर मिठाइयाँ खाने में मसगुल थी|
कुंवर ने झट से एक कटार से अपनी जंघा काट वहां से खून ले साथ में लाइ तुलसी के पत्तों पर लगाया और उसके छींटे कुंवरी पर देते हुए बोला- "पेमला ! शराफत से निकलकर भाग रहा है या पीट कर निकालूं |"
तुलसी के पत्तों से चिपके खून के छींटे पड़ते ही भूत -" बापजी जलना मत ! भाग रहा हूँ और वापस कभी नहीं आऊंगा|"कहता हुआ भाग खड़ा हुआ| भूत के निकलते ही राजकुमारी झट से ठीक हो गयी| राजा भी अपनी बेटी के ठीक होते ही बहुत खुश हुआ| उसने कुंवर को भला व खानदानी आदमी मानते हुए कुंवरी की शादी भी कुंवर के साथ करदी| अब कुंवरी व कुंवर साथ साथ राजमहल में बड़े आराम व खुशी से रहने लगे|
एक दिन कुंवर शिकार खेलने जा रहा था कि रास्ते में उसने उस नाई को बहुत बुरी व फटेहाल हालत में देखा| उसकी हालत देख कुंवर को तरस आ गया सोचा कि इसने किया तो बहुत गलत था पर है तो पुराना मित्र ही ना| सो इसकी सहायता करनी चाहिए| यही सोच कुंवर नाई को अपने साथ ले आया और उसके खाने पीने,रहने की राजमहल में व्यवस्था करवा दी|
पर नाई का स्वभाव भी बुरा ही था उसे कुंवर के ठाठ देखकर बड़ी जलन होती थी सो एक दिन मौका पाकर उसने राजा के कान भरे कि- "महाराज! आपने जिसको अपनी कुंवरी ब्याही है वह तो मेरे गांव का चमार है| मुझे खाना भी इसलिए खिलाता है कि मैं किसी को यह बात बताऊँ नहीं|"
यह सुन राजा बहुत दुखी हुआ कि उसकी बेटी चमार के घर ब्याही गयी| राजा ने कुंवर को बुलाकर डाटा कि- " चमार होते हुए तुने राजपूत बनकर कुंवरी शादी क्यों की?"
कुंवर बोला-"मैं चमार जाति का नहीं हूँ राजपूत हूँ, और मेरे पूर्वजों ने राज किया है वे भी राजा थे| उनका गाड़ा हुआ धन आज भी मेरी जानकारी में पड़ा है, कहें तो खोदकर दिखाऊं|"
और कुंवर राजा को उस तपस्वी वाली बावड़ी के बरगद के पेड़ के पास ले गया और उसकी जड़ में गर्मागर्म उकालता हुआ तेल डाला| जैसे तेल डाला वहां उपस्थित भूत भाग खड़ा हुआ और कुंवर ने खजाना खोद राजा को दिखाया| खजाना देखते ही राजा की तो आँखे फटी की फटी रह गयी इतना बड़ा खजाना तो उसके राज्य का भी नहीं था|
बस राजा की आशंका दूर हुई और फिर कुंवर व कुंवरी एक साथ मजे से रहने लगे|
एक दिन नाई ने फिर कुंवर से पुछा- " कुंवर जी मैंने आपके साथ किया तो बहुत गलत पर मित्रता के नाते मुझे माफ कर बताएं कि करतब आपने किये कैसे ?"
तब कुंवर ने नाई को कुँए वाली पूरी बात बताई| नाई लालची तो था ही, रात होते ही कुंए के अंदर जाकर बैठ गया| कि उसे भी भूतों से कुछ पता चल जाए|रात होते ही भूत आये और आपस में बात करने लगे - पेमला भूत बोला-" जबसे राजा की कुंवरी के शरीर से निकला हूँ मिठाई तो दूर रोटी का एक टुकड़ा ही नहीं मिला, भूखा मर रहा हूँ यार|"
देवला भूत बोला-" यार ऐसी ही गत अपनी बनी है,खजाना तो लोग निकाल ले गए अपन कंगले बने बैठे है|"
"जरुर अपनी बातें किसी ने सुनी है वरना किसकी मजाल जो हमारे साथ ऐसा करता|" पेमला बोला|
"हां ! लगता है ऐसा ही हुआ है , चल देखते है यहाँ कुंए में कोई है तो नहीं|" दूसरे भूत ने कहा|
और दोनों भूतों ने कुँए में झांककर देखा तो वहां नाई दुबका बैठा था| बस फिर क्या था भूत बोले- "यही है हमारा गुनाहगार, पकड़कर चीर डाले हरामखोर को|"
और भूतों ने देखते ही देखते नाई को पकड़ कर मार डाला|
इसीलिए ये कहावत सदियों से चली आ रही है -"नेकी का फल नेकी और बदी का फल बदी ही मिलता है|"

त्रिदेवों की उत्पत्ति

सष्टि के आरम्भ से पूर्व ब्रह्माण्ड जल में डूबा हुआ था। चारों ओर अन्धकार ही अन्धकार था। उस समय सूर्य, चन्द्रमा, वृक्ष, प्राणी किसी की भी उत्पत्ति नहीं हुई थी। केवल भगवती जगदम्बिका परब्रह्म के रूप में विघमान थीं।
एक बार देवी भगवती के मन में सृष्टि-रचना का विचार उत्पन्न हुआ। उन्होंने सबसे पहले एक पत्ते पर विष्णुजी की उत्पत्ति की। जन्म लेने के बाद विष्णुजी के मन में अनेक प्रश्न उठने लगे। तब देवी भगवती ने प्रकट होकर उन्हें दिव्य-ज्ञान प्रदान करते हुए तपस्या के लिये प्रेरित किया। देवी के अंतर्ध्यान होने के बाद विष्णुजी तपस्या में लीन हो गए।
भगवान विष्णु को तपस्या करते हुए अनेक वर्ष बीत गए। तपस्या के तेज से उनकी नाभि से एक कमल-पुष्प उत्पन्न हो गया। धीरे-धीरे यह पुष्प विकसित होने लगा। पूर्ण विकसित होने के बाद जब इसकी पंखुड़ियां खुलीं तो उसमें से ब्रह्माजी की उत्पत्ति हुई।
ब्रह्माजी ने अपने चारों ओर जल-ही-जल देखा। विष्णुजी के समान ही उनके मन में भी अनेक प्रश्न उठने लगे-- 'मैं कौन हूँ? मैं किस प्रकार उत्पन्न हुआ? ये दिव्य पुरूष कौन हैं जो इस समय घोर तपस्या में लीन हैं?'
तभी एक दिव्य तेज प्रकट हुआ। इस तेज को देखकर ब्रह्माजी भयभीत हो गए। तब उस तेज में से आकाशवाणी हुई-- "हे पुत्र! भयभीत मत हो। ये तेज देवी भगवती के निराकार रूप का प्रतीक है। तुम्हारी उत्पत्ति देवी भगवती की कृपा से हुई है। इस ब्रह्माण्ड में देवी भगवती ही निराकार और साकार-- दोनों अवस्थाओं में व्याप्त हैं। उन्हीं की इच्छा से प्रलय; और सृष्टि में जन्म और मृत्यु का चक्र चलता है। अतः हे पुत्र! देवी भगवती की तपस्या करो।"
ब्रह्माजी ने तपस्या आरम्भ कर दी। तत्पश्चात देवी भगवती ने शिव की उत्पत्ति की। तीनों देवों ने देवी भगवती की तपस्या करनी शुरू कर दी।
हजारों वर्षों तक तपस्या करने के बाद, अंत में देवी भगवती साक्षात प्रकट हुईं और तीनों देवों से बोलीं-- "हे त्रिदेवों! तुम्हारे अंदर मेरी ही शक्ति साकार रूप में समाहित है। मेरे द्वारा ही तुम्हारी रचना हुई है। तुम्हारी उत्पत्ति का उद्देश्य सृष्टि का कार्य सुचारू रूप से चलाना है। ब्रह्माजी सृष्टि की रचना करेंगे, विष्णु सृष्टि का पालन करेंगे और शिवजी सृष्टि का संहार करेंगे। इस प्रकार यह चक्र सदैव चलता रहेगा।"
इतना कहने के बाद भगवती ने त्रिदेवों के लिये तीन विभिन्न लोकों-- ब्रह्म-लोक, विष्णु-लोक और शिव-लोक का निर्माण किया। देवी भगवती की आज्ञा से त्रिदेवों ने अपने-अपने आसन ग्रहण कर सृष्टि-रचना का कार्य आरभ कर दिया।

मजेदार २ कहानिया

एक बार एक भारतीय व्यक्ति मरकर नर्क में पहुँचा, तो वहाँ उसने देखा कि प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी देश के नर्क में जाने की छूट है । उसने सोचा, चलो अमेरिकावासियों के नर्क में जाकर देखें, जब वह वहाँ पहुँचा तो द्वार पर पहरेदार से उसने पूछा - क्यों भाई अमेरिकी नर्क में क्या-क्या होता है ? पहरेदार बोला - कुछ खास नहीं, सबसे पहले आपको एक इलेक्ट्रिक चेयर पर एक घंटा बैठाकर करंट दिया जायेगा, फ़िर एक कीलों के बिस्तर पर आपको एक घंटे लिटाया जायेगा, उसके बाद एक दैत्य आकर आपकी जख्मी पीठ पर पचास कोडे बरसायेगा... बस ! यह सुनकर वह व्यक्ति बहुत घबराया और उसने रूस के नर्क की ओर रुख किया, और वहाँ के पहरेदार से भी वही पूछा, रूस के पहरेदार ने भी लगभग वही वाकया सुनाया जो वह अमेरिका के नर्क में सुनकर आया था । फ़िर वह व्यक्ति एक-एक करके सभी देशों के नर्कों के दरवाजे जाकर आया, सभी जगह उसे एक से बढकर एक भयानक किस्से सुनने को मिले । अन्त में थक-हार कर जब वह एक जगह पहुँचा, देखा तो दरवाजे पर लिखा था "भारतीय नर्क" और उस दरवाजे के बाहर उस नर्क में जाने के लिये लम्बी लाईन लगी थी, लोग भारतीय नर्क में जाने को उतावले हो रहे थे, उसने सोचा कि जरूर यहाँ सजा कम मिलती होगी... तत्काल उसने पहरेदार से पूछा कि यहाँ के नर्क में सजा की क्या व्यवस्था है ? पहरेदार ने कहा - कुछ खास नहीं...सबसे पहले आपको एक इलेक्ट्रिक चेयर पर एक घंटा बैठाकर करंट दिया जायेगा, फ़िर एक कीलों के बिस्तर पर आपको एक घंटे लिटाया जायेगा, उसके बाद एक दैत्य आकर आपकी जख्मी पीठ पर पचास कोडे बरसायेगा... बस ! चकराये हुए व्यक्ति ने उससे पूछा - यही सब तो बाकी देशों के नर्क में भी हो रहा है, फ़िर यहाँ इतनी भीड क्यों है ? पहरेदार बोला - इलेक्ट्रिक चेयर तो वही है, लेकिन बिजली नहीं है, कीलों वाले बिस्तर में से कीलें कोई निकाल ले गया है, और कोडे़ मारने वाला दैत्य सरकारी कर्मचारी है, आता है, दस्तखत करता है और चाय-नाश्ता करने चला जाता है...और कभी गलती से जल्दी वापस आ भी गया तो एक-दो कोडे़ मारता है और पचास लिख देता है...चलो आ जाओ अन्दर !!!
(२) असाधारण सोच :
एक बार कक्षा छठी में चार बालकों को परीक्षा मे समान अंक मिले, अब प्रश्न खडा हुआ कि किसे प्रथम रैंक दिया जाये । स्कूल प्रबन्धन ने तय किया कि प्राचार्य चारों से एक सवाल पूछेंगे, जो बच्चा उसका सबसे सटीक जवाब देगा उसे प्रथम घोषित किया जायेगा । चारों बच्चे हाजिर हुए, प्राचार्य ने सवाल पूछा - दुनिया में सबसे तेज क्या होता है ? पहले बच्चे ने कहा, मुझे लगता है - "विचार" सबसे तेज होता है, क्योंकि दिमाग में कोई भी विचार तेजी से आता है, इससे तेज कोई नहीं । प्राचार्य ने कहा - ठीक है, बिलकुल सही जवाब है । दूसरे बच्चे ने कहा, मुझे लगता है - "पलक झपकना" सबसे तेज होता है, हमें पता भी नहीं चलता और पलकें झपक जाती हैं और अक्सर कहा जाता है, "पलक झपकते" कार्य हो गया । प्राचार्य बोले - बहुत खूब, बच्चे दिमाग लगा रहे हैं । तीसरे बच्चे ने कहा - "बिजली", क्योंकि मेरे यहाँ गैरेज, जो कि सौ फ़ुट दूर है, में जब बत्ती जलानी होती है, हम घर में एक बटन दबाते हैं, और तत्काल वहाँ रोशनी हो जाती है,तो मुझे लगता है बिजली सबसे तेज होती है...अब बारी आई चौथे बच्चे की । सभी लोग ध्यान से सुन रहे थे, क्योंकि लगभग सभी "तेज" बातों का उल्लेख तीनो बच्चे पहले ही कर चुके थे । चौथे बच्चे ने कहा - सबसे तेज होता है "डायरिया"... सभी चौंके... प्राचार्य ने कहा - साबित करो कैसे ? बच्चा बोला, कल मुझे डायरिया हो गया था, रात के दो बजे की बात है, जब तक कि मैं कुछ "विचार" कर पाता, या "पलक झपकाता" या कि "बिजली" का स्विच दबाता, डायरिया अपना "काम" कर चुका था ।
कहने की जरूरत नहीं कि इस असाधारण सोच वाले बालक को ही प्रथम घोषित किया गया ।

बुधवार, 6 अप्रैल 2016

न किसी का फेंका हुआ मिले,
न किसी से ..छीना हुआ मिले,
मुझे बस मेरे.. नसीब मे
लिखा हुआ मिले,
ना मिले ये भी तो
कोई ग़म नही
मुझे बस मेरी मेहनत का
किया हुआ मिले.
न किसी का फेंका हुआ मिले,
न किसी से ..छीना हुआ मिले,
मुझे बस मेरे.. नसीब मे
लिखा हुआ मिले,
ना मिले ये भी तो
कोई ग़म नही
मुझे बस मेरी मेहनत का
किया हुआ मिले.


मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

इंटरनेट की स्पीड बडाइये

आजकल सभी अपने mobile और लैपटॉप में इन्टरनेट का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन सही स्पीड ना मिलने के कारण अक्सर लोग परेशान रहते हैं. पहले 2G, फिर 3G और अब 4G का जमाना है. उसके बावजूद लोग अपने इन्टरनेट की स्पीड से परेशान हैं. अगर आप भी अपने कंप्यूटर में इन्टरनेट की स्पीड से परेशान हैं तो कुछ आसान से ट्रिक को फॉलो कर आप इसमें सुधार कर सकते हैं.सबसे पहले Start मेन्यू में जाएं। इसमें Run में जाकर Gpedit.msc टाइप करें। इसके बाद Enter प्रेस करें
स्टेप-2 इसके बाद आपके सामने एक टैब ओपन होगा। उसमें Computer configurathion पर क्लिक करें।
स्टेप-3 इसके बाद Administrative templates पर क्लिक करें। Administrative templates पर क्लिक करने के बाद Network पर क्लिक करें।
स्टेप-4 इसके बाद आपके सामने कई ऑप्शन्स होंगे जिसमें से आपको Qos Packet Scheduler को सिलेक्ट करना है।
स्टेप-5 इस स्टेप को दोहराने से आपके इंटरनेट की स्पीड बढ़ जाएगी।
स्टेप-6 अब Limits reservable bandwidth पर क्लिक करें। इसके बाद नया टैब ओपन होगा जिसमें 3 ऑप्शन्स दिए गए हैं इसमें से आपको Disabled को सिलेक्ट करना है।
इसके बाद इसी टैब में सबसे नीचे Apply का ऑप्शन दिया गया है। इसपर क्लिक करके OK पर क्लिक करें।
ट्रिक-2 Start मेन्यू में जाएं। इसके बाद Command Prompt में जाकर। Run As Administrative को सिलेक्ट करें।
स्टेप्स netsh interface tcp set global autotuning=disabled टाइप करें।
स्टेप-3 इसके बाद OK कर दें। आप देखेंगे की आपकी इन्टरनेट स्पीड में काफी हद तक सुधार हुआ है...